रायबरेली-स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों की खुली पोल टॉर्च की रोशनी में मरीजो का होता है इलाज

रायबरेली-स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों की खुली पोल टॉर्च की रोशनी में मरीजो का होता है इलाज

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रिपोर्ट-ओम द्विवेदी(बाबा)
मो-8573856824

सिस्टम की लाचारी! सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में मोबाइल की टॉर्च में मरीजों का इलाज   

मोबाइल टॉर्च की रोशनी में मरीजों का हो रहा इलाज,बत्ती गुल, जनरेटर खराब

सीएचसी की लापरवाही:गंभीर मरीज का इलाज मोबाइल की लाइट में,जनरेटर भी खामोश

 रायबरेली-  उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर होने के तमाम दावे किये जाते हैं लेकिन समय-समय पर ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जो सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल देती हैं। इस सरकारी अस्पताल में संसाधनों का अभाव है यहां रात में लाइट कट जाए तो मरीजों को इलाज कराने के लिए खुद के मोबाइल टार्च जलाकर रोशनी करनी पड़ती हैं तब उनका इलाज होता है इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा हैं जहां एक तरफ सरकार लोगों को बेहतर स्वास्थ सुविधा देने के लिए करोड़ों खर्च कर रही है वहीं डलमऊ अस्पताल में कुछ अलग ही नजारा देखने को मिला । सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र डलमऊ में आने वाले मरीजों का इलाज मोबाइल की टॉर्च में किया जा रहा है अस्पताल के डाक्टरों को संसाधन की कमी से जूझना पड़ रहा हैं मरीजों को भी इलाज के नाम पर केवल औपचारिकता ही मिल पाती है ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं भगवान भरोसे चल रही हैं अंधेरे में इलाज के दौरान मरीजों के साथ कोई भी अनहोनी हो सकती है। 
       जानकारी के मुताबिक बुधवार को डलमऊ क्षेत्र के सराय दिलावर निवासी कृष्ण कुमार पुत्र लक्ष्मी शंकर जयसवाल उम्र लगभग 40 वर्ष रात के समय वह अपनी मोटरसाइकिल सवार होकर फतेहपुर मार्ग पर किसी काम से जा रहे थे जैसे ही वह नेवाजगंज गांव स्थित गीता हॉस्पिटल के पास पहुंचे तभी सामने से आ रहे ट्रक की तेज रोशनी आंखों में पड़ने के कारण वह बड़े गड्ढे मैं चला गया जिससे वह उछल कर सड़क पर गिर पड़े और गंभीर रूप से घायल हो गए। आसपास मौजूद लोगों की सूचना पर पहुंचे परिजनों ने इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डलमऊ पहुंचाया जहां पर बिजली न होने के कारण वहां पर मौजूद परिजनों को मोबाइल फोन की रोशनी में इलाज करवाने पर मजबूर होना पड़ा। मरीज के परिजनों ने अपने मोबाइल के टार्च जलाकर रोशनी की ताकि डॉक्टर मरहम-पट्टी और अन्य प्राथमिक उपचार कर सकें।वही घायल युवक के परिजनों ने बताया कि घंटों तक अस्पताल में किसी भी प्रकार की लाइट नहीं थी पूरा अस्पताल अंधेरे में डूबा था। किसी तरह से मोबाइल की रोशनी में डॉक्टर ने इलाज किया ।इस तरह की घटिया व्यवस्था को लेकर परिजनों में काफी रोष व्याप्त रहा।

गंभीर सवाल और अस्पताल की लचर व्यवस्था

यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों अस्पताल में बिजली जाते ही जनरेटर नहीं चलाया गया था? क्या अस्पताल प्रशासन के पास बैकअप पावर का कोई इंतजाम नहीं हैं? या अगर है भी तो वह क्यों निष्क्रिय है। मरीजों की जान परवाह किए बिना अस्पताल की यह लापरवाही उनकी जिंदगी से खिलवाड़ करने जैसी है यह घटना न केवल अस्पताल की लचर व्यवस्था को दर्शाती है बल्कि यह भी सवाल खड़ा करती है कि आखिर सरकार के स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे कितने सच्चे हैं।

शोपीस बना रहा जनरेटर 

स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने एवं इमरजेंसी सेवाओं के लिए अस्पताल में लगाया गया जनरेटर शोपीस बनकर खड़ा हुआ है यह अस्पताल प्रशासन की लापरवाही का ही नतीजा है कि रात के अंधेरे में यदि कोई मेरी इमरजेंसी में इलाज के लिए आता है तो अंधेरा होने पर जनरेटर की वैकल्पिक व्यवस्था होने के बाद भी इस सुविधा का लाभ नहीं मिल पा रहा है ऐसी स्थिति में तीमारदार मोबाइल की लाइट जलाकर अपने मरीज का इलाज कर रहे हैं।