क्या पत्रकारिता आईसीयू में है? पतन पत्रकारिता का है या यह सामाजिक संक्रमण है?-राजेश यादव

क्या पत्रकारिता आईसीयू में है? पतन पत्रकारिता का है या यह सामाजिक संक्रमण है?-राजेश यादव

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रिपोर्ट-ओम द्विवेदी(बाबा)

मो-8573856824


 रायबरेली-आज पत्रकारिता को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पत्रकारिता सचमुच आईसीयू में पहुंच चुकी है? अगर पहुंच चुकी है तो बीमारी क्या है? आर्थिक संकट, राजनीतिक दबाव, कॉरपोरेट नियंत्रण, टीआरपी की भूख, सोशल मीडिया की अंधी दौड़, पत्रकारों की मजबूरी या फिर पत्रकारिता के भीतर ही पैदा हो चुका वह संक्रमण, जिसने खबर और प्रचार के बीच की सीमा को लगभग खत्म कर दिया है? लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता का पतन सिर्फ पत्रकारिता का पतन है या फिर यह पूरे समाज के चरित्र में आए बदलाव का आईना है?

पत्रकारिता आखिर समाज से ही निकलती है। पत्रकार कोई दूसरी दुनिया से नहीं आता। वह भी इसी समाज में रहता है, इसी व्यवस्था में सांस लेता है, इसी बाजार में खरीदारी करता है और इसी राजनीति को देखता है। फिर अगर समाज बदल रहा है तो पत्रकारिता उससे अछूती कैसे रह सकती है?

एक दौर था जब पत्रकार सत्ता के दरवाजे पर जाकर सवाल करता था। आज कई जगह पत्रकार सत्ता के दरवाजे पर जाकर यह पूछता दिखाई देता है कि साहब, खबर क्या लगानी है? पहले नेता पत्रकार से डरता था कि कहीं कोई सवाल न पूछ लिया जाए। अब कई पत्रकार इस बात से डरते हैं कि कहीं सवाल पूछ लिया तो विज्ञापन न चला जाए, कहीं कोई नाराज न हो जाए, कहीं मान्यता पर असर न पड़े, कहीं कोई फोन न आ जाए और कहीं अगली प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुर्सी पीछे न कर दी जाए। फिर हम कहते हैं कि पत्रकारिता खतरे में है। खतरे में तो है ही, लेकिन खतरा बाहर से जितना है, अंदर से उससे कम नहीं है।

पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट शायद सेंसरशिप नहीं है, सबसे बड़ा संकट स्वयं-सेंसरशिप है। जब पत्रकार सवाल पूछने से पहले यह सोचने लगे कि सामने वाला कौन है, किस पार्टी का है, किसका आदमी है, किससे संबंध हैं और इससे उसे क्या नुकसान या फायदा होगा, तो फिर कलम हाथ में रह जाती है और पत्रकारिता कहीं पीछे छूट जाती है।

आज खबरों का एक बड़ा हिस्सा दो हिस्सों में बंट गया है। एक वह जो सत्ता को पसंद आए और दूसरी वह जो विरोधियों को पसंद आए। बीच में जो सच है, वह बेचारा पूछ रहा है कि मुझे कौन दिखाएगा? पत्रकारिता का काम किसी सरकार की आरती उतारना नहीं है, लेकिन पत्रकारिता का काम हर बात में सरकार को गाली देना भी नहीं है। पत्रकारिता का काम विपक्ष का प्रचार करना नहीं है और न ही विपक्ष के खिलाफ सरकारी प्रेस नोट को खबर बनाकर परोस देना है। पत्रकारिता का काम केवल एक है सवाल।

सवाल सत्ता से हो, सवाल विपक्ष से हो, सवाल अफसर से हो, सवाल माफिया से हो, सवाल पत्रकार से भी हो और सवाल खुद से भी हो। लेकिन आज समस्या यह है कि सवाल भी राजनीतिक हो गया है। अगर आपने सरकार से सवाल किया तो आप सरकार विरोधी, अगर आपने विपक्ष से सवाल किया तो आप सरकार समर्थक और अगर आपने दोनों से सवाल किया तो लोग पूछेंगे कि आप किसके आदमी हैं? यही तो सबसे बड़ा संक्रमण है।

समाज ने पत्रकार को पत्रकार के रूप में देखना बंद कर दिया है। अब वह खबर पढ़ने से पहले पत्रकार का खेमे से रिश्ता खोजता है। सच क्या है, यह बाद में पूछा जाता है। यह सिर्फ पत्रकारिता की बीमारी नहीं है, यह समाज की बीमारी है।

सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को संभावित पत्रकार बना दिया है। मोबाइल हाथ में है, कैमरा सामने है, फेसबुक पर लाइव है, यूट्यूब पर चैनल है और व्हाट्सऐप पर लाखों लोगों तक पहुंचने की क्षमता है। यह लोकतंत्र के लिए बड़ी ताकत है, लेकिन यही ताकत जब बिना सत्यापन के इस्तेमाल होती है तो अफवाह को खबर और झूठ को सच बना देती है। अब खबर पहले वायरल होती है और सत्यापन बाद में। पहले पत्रकार खबर की पुष्टि करता था और फिर प्रकाशित करता था। अब कई बार खबर पहले पोस्ट हो जाती है और बाद में पत्रकार सोचता है कि इसकी पुष्टि भी कर लें।

जनता भी कम जिम्मेदार नहीं है। जिस खबर से उसकी राजनीतिक भावनाएं खुश होती हैं, वह बिना पढ़े शेयर कर देती है। विरोधी पक्ष से जुड़ी खबर हो तो उसे सच मानने के लिए सिर्फ इतना काफी है कि वह उसके व्हाट्सऐप ग्रुप में आई है। यानी आज हर व्यक्ति अपनी पसंद का सत्य लेकर घूम रहा है। जिसे जो सच पसंद है, वही उसका सच है। फिर पत्रकारिता अकेली दोषी कैसे हो सकती है?

हाँ, पत्रकारिता को अपने भीतर भी झांकना होगा। पत्रकारिता सिर्फ मिशन नहीं है, आज वह उद्योग भी है। संस्थान चलाने के लिए पैसा चाहिए। पत्रकार को वेतन चाहिए। कैमरा चाहिए, स्टूडियो चाहिए, वेबसाइट चाहिए, सर्वर चाहिए, यात्रा चाहिए और रिपोर्टिंग के लिए संसाधन चाहिए। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब विज्ञापन खबर की दिशा तय करने लगे, जब मालिक का कारोबारी हित संपादकीय निर्णय से बड़ा हो जाए और जब पत्रकार को यह बताया जाने लगे कि किसके खिलाफ नहीं लिखना है।तब सवाल उठता है कि क्या हम पत्रकारिता कर रहे हैं या मैनेजमेंट?

यह सवाल सिर्फ बड़े मीडिया संस्थानों से नहीं है। छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भी खुद से पूछना होगा। आज हजारों लोग पत्रकारिता के नाम पर सोशल मीडिया चला रहे हैं। कुछ शानदार काम कर रहे हैं, लेकिन कुछ ने पत्रकारिता को सिर्फ सनसनी, गाली, आरोप और वायरल वीडियो का पर्याय बना दिया है। किसी के खिलाफ आरोप लगाना आसान है, किसी की तस्वीर लगाकर सवाल पूछना आसान है, लेकिन दस्तावेज खोजना, तथ्य जांचना, दोनों पक्ष लेना और फिर खबर प्रकाशित करना कठिन है। यही कठिन काम पत्रकारिता है। बाकी सब कंटेंट हो सकता है।

और पत्रकारिता को बचाना है तो हमें फिर से यह अंतर समझना होगा कि कंटेंट और पत्रकारिता एक चीज नहीं हैं। कंटेंट मनोरंजन कर सकता है, पत्रकारिता समाज को असहज कर सकती है। कंटेंट आपको वह दिखाता है जो आप देखना चाहते हैं, पत्रकारिता आपको वह दिखाती है जिसे शायद आप देखना नहीं चाहते। यही वजह है कि असली पत्रकारिता हमेशा आसान नहीं होती।

सच्चा पत्रकार कई बार अकेला होता है। कई बार उसके पास बड़ा चैनल नहीं होता, बड़ा विज्ञापनदाता नहीं होता, सत्ता नाराज होती है, विपक्ष नाराज होता है और कई बार अपने ही साथी नाराज होते हैं। लेकिन अगर वह सच के साथ खड़ा है तो पत्रकारिता जीवित है।

आज जरूरत पत्रकारिता को आईसीयू से बाहर निकालने की है। लेकिन इसके लिए केवल पत्रकारों को दोष देने से काम नहीं चलेगा। सत्ता को समझना होगा कि आलोचना लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, उसकी ऑक्सीजन है। मीडिया मालिकों को समझना होगा कि संस्थान की आर्थिक मजबूती जरूरी है, लेकिन संपादकीय स्वतंत्रता उससे भी ज्यादा जरूरी है। पत्रकारों को समझना होगा कि सुविधा और स्वतंत्रता हमेशा साथ नहीं चलती। और पाठकों को भी तय करना होगा कि उन्हें सच चाहिए या सिर्फ अपनी पसंद की खबर।

क्योंकि पत्रकारिता का भविष्य सिर्फ पत्रकारों के हाथ में नहीं है। वह पाठकों के हाथ में भी है। जिस समाज में लोग सवाल पूछना बंद कर देंगे, वहां पत्रकारिता धीरे-धीरे मर जाएगी। जिस समाज में लोग सवाल पूछेंगे, वहां पत्रकारिता को कोई पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता।

इसलिए आज सवाल यह नहीं होना चाहिए कि पत्रकारिता आईसीयू में है या नहीं। सवाल यह होना चाहिए कि क्या समाज पत्रकारिता को आईसीयू से बाहर निकालना चाहता है?

अगर हाँ, तो पत्रकार को भी अपनी कलम वापस उठानी होगी। सत्ता से सवाल करना होगा, माफिया से सवाल करना होगा, अफसर से सवाल करना होगा, मालिक से सवाल करना होगा और जरूरत पड़े तो खुद पत्रकार बिरादरी से भी सवाल करना होगा।

क्योंकि पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत उसका कैमरा नहीं है, उसकी वेबसाइट नहीं है, उसका चैनल नहीं है और न ही उसके लाखों फॉलोअर्स हैं। उसकी असली ताकत सिर्फ एक है उसकी विश्वसनीयता।

जिस दिन जनता को लगेगा कि पत्रकार की कलम बिकती नहीं है, उस दिन पत्रकारिता फिर खड़ी हो जाएगी। लेकिन जिस दिन जनता को यह लग गया कि खबर भी बिकती है, सवाल भी बिकता है और पत्रकार भी बिकता है, उस दिन आईसीयू  में सिर्फ पत्रकारिता नहीं होगी, लोकतंत्र भी आईसीयू में होगा। और तब डॉक्टर भी हम ही होंगे, मरीज भी हम ही होंगे और शायद लापरवाही का जिम्मेदार भी हम ही होंगे।

इसलिए फैसला करना होगा कि कलम सत्ता के दरबार में बैठेगी या जनता के बीच? पत्रकार सवाल पूछेगा या सवालों से बचने के बहाने ढूंढेगा? खबर सच बताएगी या सिर्फ वही दिखाएगी जो बिक सकता है? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम पत्रकारिता को बचाना चाहते हैं या सिर्फ उसकी मौत पर शोकसभा करना चाहते हैं?

क्योंकि पत्रकारिता अभी आईसीयू में है तो शायद इलाज संभव है। लेकिन अगर हमने सवाल पूछना छोड़ दिया, तो अगली खबर शायद यह होगी कि लोकतंत्र की पत्रकारिता ने आखिरी सांस ले ली।