रायबरेली-परीक्षित मोक्ष और सुदामा चरित्र - दो मित्रता और मुक्ति की कथाएँ
रिपोर्ट-ओम द्विवेदी(बाबा)
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सतांव-रायबरेली-विकास क्षेत्र के बरउवा गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का बुधवार को समापन हो गया। समापन मे कथा वाचक आचार्य अभिषेकाचार्य महराज ने परीक्षित मोक्ष व सुदामा चरित्र की कथा सुनाई।
कथा वाचक आचार्य अभिषेकाचार्य महराज ने कहा कि राजा परीक्षित एक बार शिकार पर गए और प्यास लगने पर शमीक मुनि के आश्रम में पहुँचे। मुनि समाधि में थे, उत्तर न मिलने पर क्रोध में परीक्षित ने उनके गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया। मुनि के पुत्र श्रृंगी को पता चला तो उसने श्राप दिया - सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से परीक्षित की मृत्यु होगी। आचार्य ने कहा कि श्राप सुनकर परीक्षित ने राजपाट त्याग दिया और गंगा किनारे अनशन पर बैठ गए। देवर्षि नारद की प्रेरणा से शुकदेव जी वहाँ आए। परीक्षित ने सात दिनों तक शुकदेव जी से श्रीमद् भागवत कथा सुनी। कथा सुनते-सुनते उनका मोह नष्ट हो गया और उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। सातवें दिन तक्षक ने डसा, पर परीक्षित पहले ही मोक्ष प्राप्त कर चुके थे। उनका शरीर ही जला, आत्मा भगवान में लीन हो गई। यह कथा बताती है कि अंतिम समय में भी भगवान की कथा से मोक्ष संभव है।
सुदामा चरित्र की कथा सुनाते हुए आचार्य ने कहा कि सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के मित्र और गुरु सांदीपनि के आश्रम के सहपाठी थे। सुदामा जी अत्यंत गरीब ब्राह्मण, भिक्षा माँगकर जीवन चलाते थे। पत्नी के कहने पर वे द्वारका में कृष्ण से मिलने गए, साथ में चार मुट्ठी चावल (तंदुल) भेंट के लिए ले गए। आचार्य ने कहा कि कृष्ण ने महल के द्वार पर ही दौड़कर सुदामा को गले लगाया, उनके चरण धोए और मित्रता का आदर किया। संकोच में सुदामा चावल छिपा रहे थे, कृष्ण ने छीनकर बड़े प्रेम से खाए। सुदामा कुछ माँग नहीं पाए और खाली हाथ लौट आए। घर पहुँचकर देखा कि उनकी टूटी झोपड़ी के स्थान पर महल खड़ा है, सब समृद्धि से भरपूर है। उन्होंने कहा कि सच्ची मित्रता निस्वार्थ होती है और भगवान अपने भक्त की बिना कहे ही सहायता करते हैं। इस मौके पर विनोद सिंह, अनीता सिंह, संजय सिंह आदि मौजूद रहे।

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