बिहार के इस जिले में देवी अहिल्या को मिली थी श्राप से मुक्ति, मंदिर में बैंगन चढ़ाने की है परंपरा

बिहार के इस जिले में देवी अहिल्या को मिली थी श्राप से मुक्ति, मंदिर में बैंगन चढ़ाने की है परंपरा

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बिहार में एक बढ़कर एक तीर्थ स्थल हैं। इनमें से कई बेहद प्राचीन हैं। इन स्थलों पर हमेशा पर्यटकों की भीड़ देखने को मिल जाती है। इसी क्रम में दरभंगा जिला का अहिल्या मंदिर भी है। इस स्थान को लेकर ऐसा कहा जाता है कि रामायण काल में भगवान राम ने इसी स्थान पर देवी अहिल्या का उद्धार किया था।

इस बात का जिक्र बह्म पुराण में भी मिलता है। करीब 400 साल पहले दरभंगा के राजा ने यहां उनका मंदिर बनवाया था।

अहिल्या स्थान जिला सदर अनुमंडल के अंतर्गत अहियारी गांव में है। ये देवी सीता के जन्म स्थान से करीब 40 किलोमीटर दूर है। प्रचलित कथाओं के मुताबिक जब ऋषि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर अयोध्या से मिथिला को जा रहे थे। जब वह उन्होंने एक निर्जन आश्रम को देखा। इस पर राम ने ऋषि से पूछा कि यहां आश्रम तो है लेकिन यहां कोई दिखाई नहीं दे रहा। इस पर विश्वामित्र ने बताया कि पहले यह स्थान महर्षि गौतम का था। वह यहां अपनी पत्नी के साथ रहते थे।

एक बार इंद्र उनकी पत्नी देवी अहिल्या पर मोहित होकर कुटी में पहुंच गया। इस पर अहिल्या ने पहचान लिया और उन्हें आश्रम से बाहर जाने को कहा। जब इंद्र जाने लगा तभी गौतम ऋषि ने उसे अपने वेश में देखकर नाराज हो गए और इंद्र के साथ पत्नी अहिल्या को भी श्राप दे दिया। जिसके बाद अहिल्या पत्थर के रूप में बदल गईं।

 ऋषि विश्वामित्र की बातें सुनकर भगवान राम ने पत्थर रूप में अहिल्या को देखा स्पर्श कर उनका उद्धार किया। इतिहासकारों की मानें तो 1635 में दरंभगा के राजा छत्र सिंह ने यहां मंदिर का निर्माण करवाया था। यहां देवी अहिल्या, गौतम ऋषि के अलावा भगवान राम, लक्ष्मण और देवी सीता की मूर्ति भी स्थापित है। ऐसा कहा जाता है कि संत रामानुज ने यहां एक स्तंभ और पिंड का निर्माण भी कराया था।

बैंगन चढ़ाने की परंपरा

रामनवमी के दिन गौतम और अहिल्या स्थान पर भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है। इस मौके पर श्रद्धालु कुंड में स्नान करने के बाद अपने कंधे पर बैंगन का भार लेकर मंदिर आते है। मान्यता है कि इससे अहिला रोग से उन्हें मुक्ति मिलती है। यहां नेपाल से भी लोग पूजा करने आते हैं।