7 अप्रैल: इंदिरा गांधी ने साहित्य-भूमि को दिया ‘आचार्य द्विवेदी मार्ग’ का गौरव
इतिहास
-एक तारीख, एक मार्ग और एक युग: जब युगप्रवर्तक की स्मृति को मिला राष्ट्रीय सम्मान
- सरांय बैरिया खेड़ा से दौलतपुर तक 19 किमी मार्ग का निर्माण, पेट्रोमेक्स की रोशनी में रात-दिन चला था कार्य
- चीन यात्रा से उपजी प्रेरणा, प्रधानमंत्री बनने के बाद साकार हुई साहित्यिक श्रद्धांजलि
रायबरेली। 7अप्रैल, 1973 यह तिथि महज कैलेंडर का एक अंक नहीं, बल्कि रायबरेली की सांस्कृतिक चेतना में अंकित वह स्वर्णिम अध्याय है, जब स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने हिंदी के युगप्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की स्मृति को राष्ट्रीय पहचान प्रदान करते हुए सरांय बैरिया खेड़ा–भोजपुर से उनके जन्मग्राम दौलतपुर तक जाने वाले 19 किमी लंबे ‘आचार्य द्विवेदी मार्ग’ का उद्घाटन किया था। यह केवल एक सड़क का लोकार्पण नहीं, बल्कि उस युगपुरुष के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का सशक्त प्रकटीकरण था, जिसने हिंदी की खड़ी बोली को दिशा और प्रतिष्ठा दी।
लालगंज-रालपुर मार्ग पर स्थित सरांय बैरिया खेड़ा से शुरू होकर भोजपुर होते हुए दौलतपुर तक पहुंचने वाला यह मार्ग कभी एक साधारण कच्चा रास्ता 'गलियारा' था। अचानक जिले के सरकारी अमले को जैसे ही नई दिल्ली का यह संदेश मिला कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी आचार्य द्विवेदी के जन्मस्थल का रुख करेंगी, प्रशासनिक तंत्र ने इसे संकल्प का प्रश्न बना लिया। दिन-रात अथक श्रम, पेट्रोमेक्स की रोशनी में लगातार चल रहे कार्य और सीमित संसाधनों के बीच अदम्य इच्छाशक्ति ने देखते ही देखते इस कच्चे रास्ते को एक सुदृढ़ पक्के मार्ग में बदल दिया। यह निर्माण आज भी उस दौर की प्रतिबद्धता और कार्यसंस्कृति का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
इस ऐतिहासिक निर्णय के पीछे एक प्रेरक प्रसंग भी जुड़ा है। इंदिरा जी के करीबी रहे पं. गया प्रसाद शुक्ल गुरूजी के अनुसार, इंदिरा गांधी द्वारा दौलतपुर मार्ग बनवाने का किस्सा यूं है-'इंदिरा जी 1954 में अपने पिता प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ चीन के दौरे पर गईं। वहीं उन्हें एक लाइब्रेरी में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखी गई एक पुस्तक प्राप्त हुई। उन्हें बताया गया कि आचार्य द्विवेदी रायबरेली में जन्मे थे।' तब उनके पति फिरोज गांधी रायबरेली के सांसद थे। इस दौरे के दौरान उनकी आचार्य द्विवेदी के व्यक्तित्व में दिलचस्पी बढ़ी। वहीं से उनके मन में इस महान साहित्यकार के प्रति सम्मान और जिज्ञासा का भाव जागृत हुआ।
1967 में रायबरेली से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद इंदिरा गांधी का यह जुड़ाव और गहरा हुआ। प्रधानमंत्री बनने के पश्चात उन्होंने आचार्य द्विवेदी के जन्मस्थान तक मार्ग का निर्माण कराकर उन्हें अपनी सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की। हालांकि, उद्घाटन के उपरांत उनके दौलतपुर आगमन को लेकर विभिन्न मत प्रचलित हैं। कुछ के अनुसार वे जन्मस्थल तक पहुंचीं, जबकि अन्य मतों में भोजपुर में ही कार्यक्रम संपन्न होने का उल्लेख मिलता है। तथ्यों के इस अंतर के बावजूद यह निर्विवाद है कि 7 अप्रैल 1973 ने आचार्य द्विवेदी की स्मृतियों को जन-जन तक पहुंचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
समय के साथ उपेक्षा की परतों में दबा यह शिलापट आज 53 वर्ष बाद भी पुनः अपने गौरव के साथ खड़ा है, जो उस स्वर्णिम दौर का कालजयी साक्ष्य बना हुआ है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति न्यास के प्रयासों से इसका पुनरोद्धार संभव हो सका, जिसमें पूर्व प्रधानाचार्य एवं पत्रकार अशोक त्रिवेदी तथा अतुल त्रिवेदी का विशेष योगदान रहा।
आचार्य द्विवेदी की स्मृतियों के संरक्षण का सिलसिला दशकों पुराना है। 1954 में द्विवेदी स्मारक संघ का गठन, 1964 में जन्मशती वर्ष पर भव्य आयोजन, सुमित्रानंदन पंत द्वारा प्रतिमा अनावरण, 1966 में डाक टिकट जारी होना, 1998 के बाद स्मृति न्यास की सक्रियता, वर्ष 2000 में पुस्तकालय-वाचनालय का निर्माण, 2010 में सोनिया गांधी द्वारा प्रतिमा अनावरण तथा वर्तमान में ‘आचार्य द्विवेदी वाटिका’ का निर्माण ये सभी अथक प्रयास इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि रायबरेली ने अपने इस युगदृष्टा साहित्यकार की स्मृतियों को सहेजने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति न्यास रायबरेली के सचिव गौरव अवस्थी बताते हैं कि आज भी सरांय बैरिया खेड़ा मोड़ पर स्थापित वह शिलापट राहगीरों को ठहरकर यह सोचने को विवश करता है कि एक साहित्यकार के प्रति सम्मान किस प्रकार इतिहास का अमिट अध्याय बन जाता है। यह केवल एक मार्ग का उद्घाटन नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य के उस युगप्रवर्तक के प्रति राष्ट्र की श्रद्धा का प्रतीक है, जिसकी वाणी और विचार आज भी हिंदी की आत्मा में धड़कते हैं।
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रायबरेली के स्वर्णिम दौर का कालजयी शिलालेख
शिलापट का मजमून है-'स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर सराय बैरिया खेड़ा- भोजपुर- दौलतपुर (आचार्य द्विवेदी) मार्ग का उद्घाटन माननीया श्रीमती इंदिरा गांधी (प्रधानमंत्री भारत सरकार) के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ। दिनांक 7 अप्रैल 1973 तद्नुसार शनिवार चैत्र 17 शक 1895।'
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गांधी परिवार और आचार्य द्विवेदी
- श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में ही 15 मई 1966 को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पर 15 पैसे का डाक टिकट जारी हुआ
- दौलतपुर में स्थापित आचार्य द्विवेदी की प्रतिमा का अनावरण 30 नवंबर 2010 को तत्कालीन सांसद एवं यूपीए की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी ने किया
- गांधी परिवार के 'हनुमान' कैप्टन सतीश शर्मा ने सांसद निधि से दौलतपुर में पुस्तकालय-वाचनालय भवन निर्मित कराया

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